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प्रेमचंद की ‘गुल्ली-डंडा’ – बचपन और जीवन का अनोखा दर्शन || गुल्ली-डंडा: प्रेमचंद की कहानी का सार और समीक्षा || बचपन, दोस्ती और जीवन-दर्शन: प्रेमचंद की ‘गुल्ली-डंडा’

  गुल्ली-डंडा – कहानी की समीक्षा     भूमिका मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य के यथार्थवादी कथाकार माने जाते हैं। उनकी कहानियाँ केवल मनोरंजन नहीं , बल्कि समाज और जीवन के गहरे सत्य को उजागर करती हैं। “ गुल्ली-डंडा” उनकी ऐसी ही कालजयी कहानी है , जिसमें बचपन की मासूमियत , दोस्ती की आत्मीयता और जीवन-दर्शन का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यह कहानी बताती है कि साधारण-सा खेल भी इंसान के जीवन को गहरी सीख दे सकता है।   1. कथानक ( Plot) प्रेमचंद की यह कहानी एक साधारण से दिखने वाले खेल के माध्यम से गहरे जीवन-दर्शन को प्रस्तुत करती है। कथाकार (मैं) अपने बचपन की यादों में लौटता है और बताता है कि किस तरह गाँव के बच्चों के बीच गुल्ली-डंडा का खेल सबसे प्रिय हुआ करता था। खेल में सबसे निपुण था गया । समय बीतता है , सब बच्चे बड़े हो जाते हैं। कथाकार पढ़-लिखकर नौकरी करता है और सामाजिक रूप से ऊपर उठ जाता है , पर गया अपने गरीब हालात में ही रह जाता है। एक दिन दोनों का आमना-सामना होता है और फिर से गुल्ली-डंडा खेला जाता है। कथाकार आश्चर्यचकित होता है कि गया आज भी उतना ही दक्...