मन्नू भंडारी का ‘स्वामी’ उपन्यास समीक्षा | कथानक, पात्र, स्त्री विमर्श और आलोचनात्मक विश्लेषण || ‘स्वामी’ उपन्यास की विस्तृत समीक्षा | मन्नू भंडारी | कथानक, पात्र-चित्रण, भाषा-शैली और संदेश || स्वामी उपन्यास समीक्षा: प्रेम, विवाह और स्त्री के अंतर्द्वंद्व की कहानी | Mannu Bhandari Swami Review ||
पुस्तक समीक्षा :- “स्वामी” – मन्नू भंडारी 1. भूमिका मन्नू भंडारी हिंदी की उन महत्वपूर्ण कथाकारों में हैं जिन्होंने मध्यवर्गीय जीवन , स्त्री-पुरुष संबंधों , पारिवारिक तनाव और व्यक्ति के भीतर चलने वाले मनोवैज्ञानिक द्वंद्व को अत्यंत सहज भाषा में अभिव्यक्त किया। उनके साहित्य में स्त्री केवल परिवार की भूमिका निभाने वाली पात्र नहीं है , बल्कि अपनी इच्छाओं , असहमतियों , आकांक्षाओं और आत्मसम्मान के साथ उपस्थित एक स्वतंत्र मनुष्य है। ‘स्वामी’ इसी रचनात्मक दृष्टि का महत्वपूर्ण उदाहरण है। ‘ स्वामी’ की एक विशेषता यह है कि यह पूरी तरह मौलिक कथावस्तु से निर्मित उपन्यास नहीं , बल्कि शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की प्रसिद्ध कहानी ‘स्वामी’ का मन्नू भंडारी द्वारा किया गया पुनर्लेखन है। लेकिन इसे केवल शरतचंद्र की कहानी का विस्तार कहना उचित नहीं होगा। मन्नू भंडारी ने मूल कथा की परिस्थितियों , पात्रों और विशेष रूप से नायिका के मनोविज्ञान की पुनर्व्याख्या की है। उन्होंने शरतचंद्र की सौदामिनी के भीतर मौजूद गहरे पाप-बोध और आत्म-धिक्कार को केंद्र नहीं बनाया , बल्कि आधुनिक स्त्री के स्वतंत्र नि...