अलग्योझा कहानी समीक्षा: प्रेमचंद के यथार्थ का सबसे कड़वा सच || अलग्योझा: गरीबी, अन्याय और मानव संवेदना की मार्मिक कथा || प्रेमचंद की ‘अलग्योझा’ का विश्लेषण: समाज की कठोर सच्चाई
“ अलग्योझा” – कहानी की समीक्षा 1. कथानक ( Plot) कहानी की शुरुआत होती है जब भोला महतो अपनी पहली पत्नी के मरने के बाद दूसरी शादी करता है। उसका बेटा रग्घू , जो दस वर्ष का है , अपनी माँ की लापरवाही और पिता-सदृश व्यक्ति की अनुपस्थिति का सामना करता है। घर में नया माहौल बनता है—रग्घू पर माँ-सही देखभाल नहीं होती , और पिता तथा नई माँ-द्वारा उसे काम पर लगाया जाता है। कहानी आगे बढ़ती है जब रग्घू अपने परिश्रम और ईमानदारी के बल पर कुछ उपलब्धि देता है और समाज की नजर में बढ़ता है , लेकिन अंत में “अलग्योझा” यानी अलग होने की क्रिया उसके जीवन में आती है—दृष्टिगत और यथार्थ में। कहानी का मुख्य मोड़ यह है कि रग्घू को यह एहसास होता है कि घर-परिवार , सामाजिक प्रतिष्ठा , प्रेम-संबंध और आर्थिक संघर्ष कैसे एक-दूसरे से जुड़े हैं। अंत में उसके लिए यह स्पष्ट हो जाता है कि “अलग” होना सिर्फ शारीरिक नहीं , सामाजिक और मानसिक भी है। 2. पात्र ( Characters) रग्घू – मुख्य पात्र। साहसी , मेहनती , आत्मनिर्भर बचपन से ही संघर्ष में पला-बढ़ा। उसकी पीड़ा और संघर्ष कहानी को गहराई देते हैं...